30 जनवरी पुण्यतिथि विशेष: माखन दादा के नाम पर कॉलेज, पर भवन नहीं— 26 साल का इंतजार

30 जनवरी पुण्यतिथि पर जानिए माखनलाल चतुर्वेदी का योगदान और खंडवा में उनके नाम का कर्मवीर विद्यापीठ पत्रकारिता कॉलेज 26 साल से भवन के बिना क्यों भटक रहा।

30 जनवरी पुण्यतिथि विशेष: माखन दादा के नाम पर कॉलेज, पर भवन नहीं— 26 साल का इंतजार
30 जनवरी पुण्यतिथि विशेष: माखन दादा के नाम पर कॉलेज, पर भवन नहीं— 26 साल का इंतजार

अजीत लाड़ - 8120060200

30 जनवरी… यह तारीख सिर्फ एक पुण्यतिथि नहीं, बल्कि उस चेतना की याद है जिसने शब्दों को हथियार बनाया, कलम को क्रांति में बदला और पत्रकारिता को राष्ट्रधर्म की पहचान दी। ख्यातिप्राप्त कलमकार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित माखनलाल चतुर्वेदी— जिनकी कर्मभूमि खंडवा रही, जिनकी लेखनी ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ “कर्मवीर” के रूप में रणभेरी छेड़ी… आज उनकी पुण्यतिथि पर खंडवा को आत्ममंथन करना चाहिए।

क्योंकि जिस शहर ने “माखन दादा” को अपना कर्मयोगी माना… उसी शहर में उनकी स्मृति से जुड़ा ‘कर्मवीर विद्यापीठ पत्रकारिता कॉलेज’ आज भी एक स्थायी पहचान और अपने भवन के लिए संघर्ष कर रहा है।

माखनलाल चतुर्वेदी: शब्दों का योद्धा, पत्रकारिता का शिखर

पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का नाम आते ही सिर्फ कविता या साहित्य नहीं, बल्कि आज़ादी की जिद, स्वाभिमान की आग, और पत्रकारिता की सच्चाई याद आती है।

उन्होंने जब “कर्मवीर” पत्र का प्रकाशन शुरू किया, तब यह सिर्फ अखबार नहीं था—

यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन-जन में जागरण का मंच था।

आज जब पत्रकारिता बाजार और टीआरपी के दबाव में लड़खड़ा रही है, तब माखन दादा का जीवन हमें बताता है कि पत्रकारिता का असली अर्थ क्या है—

सत्ता से सवाल, जनता के पक्ष में निर्भीक आवाज और राष्ट्रहित में निडर कलम।

खंडवा की शर्मनाक हकीकत: नाम माखन दादा का, पर कॉलेज किराये का!

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि खंडवा, जो माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मभूमि रहा, वहीं उनके नाम पर शुरू हुआ कर्मवीर विद्यापीठ पत्रकारिता कॉलेज पिछले 26 वर्षों से अलग-अलग स्थानों पर किराये के भवनों में संचालित हो रहा है।

26 साल… यानी एक पूरी पीढ़ी तैयार हो गई,

लेकिन कॉलेज को आज तक अपना स्थायी भवन नहीं मिला।

यह सवाल सिर्फ एक भवन का नहीं है,

यह सवाल खंडवा की प्राथमिकताओं का है।

यह सवाल राजनीतिक इच्छाशक्ति का है।

और यह सवाल उस व्यवस्था का है, जो मंच पर श्रद्धांजलि देती है, पर जमीन पर स्मृति को ठिकाना तक नहीं देती।

घोषणा हुई… फिर भी नहीं हुआ निर्माण!

सबसे दुखद पहलू यह है कि इस कॉलेज के लिए पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा सुसज्जित भवन निर्माण की घोषणा भी की गई थी।

घोषणा हुई, उम्मीद जगी…

लेकिन फिर वही पुरानी कहानी—

फाइलें चलीं, बैठकें हुईं, फोटो खिंचे…

और उसके बाद वर्षों तक सन्नाटा।

आज भी कॉलेज भटक रहा है।

और सवाल वही है—

जब घोषणा हो चुकी थी तो निर्माण क्यों नहीं हुआ?

कौन जिम्मेदार है?

और खंडवा की राजनीति इस मुद्दे पर चुप क्यों है?

राजनीति का मौन: श्रद्धांजलि मंच पर, उदासीनता जमीन पर

खंडवा में हर साल पुण्यतिथि पर भाषण होते हैं, पुष्पांजलि होती है, प्रतिमा और फोटो पर माल्यार्पण होता है।

लेकिन माखन दादा के नाम पर शुरू संस्था के लिए स्थायी भवन की मांग आते ही सबके स्वर धीमे पड़ जाते हैं।

यह वही राजनीति है जो हर चुनाव में विकास के दावे करती है,

लेकिन शिक्षा और पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में

सिर्फ नाम की पूजा करती है,

काम की नहीं।

अगर खंडवा की राजनीति वास्तव में माखन दादा का सम्मान करती,

तो 26 साल तक कॉलेज किराये के भवनों में नहीं चलता।

कर्मवीर विद्यापीठ सिर्फ कॉलेज नहीं… यह भविष्य की पत्रकारिता की नर्सरी है

यह समझना जरूरी है कि कर्मवीर विद्यापीठ सिर्फ एक संस्था नहीं है।

यह वह जगह है जहां से निकलकर छात्र पत्रकारिता की दिशा तय करते हैं—

और आज के दौर में जब फेक न्यूज, अफवाह और प्रोपेगेंडा का बाजार फैला है,

तब एक मजबूत पत्रकारिता संस्थान की भूमिका और भी बढ़ जाती है।

यदि इस कॉलेज को अपना भवन मिलता,

तो खंडवा में पत्रकारिता शिक्षा को एक नई पहचान मिलती।

यहां आधुनिक स्टूडियो, डिजिटल लैब, मीडिया रिसर्च सेंटर और प्रशिक्षण सुविधाएं बन सकती थीं।

युवाओं को बाहर जाने की मजबूरी कम होती।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि

खंडवा ने माखन दादा की विरासत को सिर्फ स्मृति तक सीमित कर दिया है।

अब भी वक्त है: श्रद्धांजलि नहीं, संकल्प चाहिए

30 जनवरी को अगर हम सच में पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को याद करना चाहते हैं,

तो पुष्पांजलि के साथ एक सवाल भी उठाना होगा—

“कर्मवीर विद्यापीठ का भवन कब बनेगा?”

आज जरूरत है कि:

कॉलेज भवन निर्माण के लिए स्पष्ट बजट और भूमि तय हो

प्रशासनिक स्तर पर टाइमलाइन घोषित की जाए

जनप्रतिनिधि सिर्फ बयान नहीं, कार्यवाही करें

शहर के पत्रकार, समाजसेवी और विद्यार्थी एकजुट होकर आवाज उठाएं

क्योंकि माखन दादा की आत्मा को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि

उनके नाम की संस्था को

भटकने से मुक्ति मिले।

माखन दादा की कलम अमर है… पर क्या उनकी विरासत भी सुरक्षित है?

पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने ब्रिटिश हुकूमत के सामने सिर नहीं झुकाया।

उन्होंने शब्दों से क्रांति की।

उन्होंने पत्रकारिता को “धंधा” नहीं, “धर्म” माना।

आज खंडवा को तय करना है कि

क्या हम उन्हें सिर्फ स्मरण करेंगे,

या उनके नाम पर बनी संस्था को सम्मानजनक भविष्य भी देंगे?

क्योंकि इतिहास यह नहीं देखता कि आपने कितनी बार श्रद्धांजलि दी…

इतिहास यह देखता है कि आपने विरासत के लिए क्या किया।

30 जनवरी— पुण्यतिथि पर यही संकल्प हो:

“कर्मवीर विद्यापीठ को उसका अपना भवन, उसकी पहचान और उसका सम्मान मिलेगा।”